आत्म निरीक्षण

आत्म निरीक्षण

विपश्यना आत्म निरीक्षण का एक तरीका है।करीब 2500साल पूर्व गौतम बुद्ध ने इसकी खोज की थी।बीच में यह विद्या लुप्त हो गई थी। दिवंगत सत्य नारायण गोयंका सन् 1969मे म्यांमार से भारत लेकर आए। प्रक्रिया में पहले तीन दिन आती -जाती स्वांस को लगातार देखना होता है।इसे 'आनापान 'कहते हैं। 'आन' मतलब आने वाली स्वांस तथा'अपान' मतलब जाने वाली स्वांस । इसमें आरामदायक स्थिति में बैठकर आंखें बंद की जाती है।कमर तथा गर्दन को सीधी रखी जाती है। फिर अपनी नाक के दोनों छेदों पर फोकस कर दिया जाता है। और हर स्वांस को नाक में आते जाते महसूस किया जाता है।स्वांस नार्मल तरिके से ही लेनी होती है।स्वांस देखने पर पता चलता है कि हमारा मन कितना चंचल है।मन को बार-बार खींच कर स्वांस पर लाना पड़ता है। पहले तीन दिन तक बस यही करना होता है।


         विपश्यना का अर्थ है विशिष्ट रूप से देखना जो चिज़ जैसी दिखाई देती है, उसे उसके असली रूप में देखना।ना कि उसकी व्याख्या हमारा अवचेतन मन कर दे।
  विपश्यना में शरीर की संवेदनाओं पर ध्यान लगाया जाता है। हमारे शरीर के अलग-अलग हिस्सों में हर वक्त पैदा होती है। सर्दी,गर्मी, खुजली आदि हो सकती है।बस इन्हें साक्षी भाव से देखना है।दुख के प्रति द्वेष तथा सुखद संवेदनाओं के प्रति राग नहीं आने देना है। संतुलन की स्थिति में रहना है। विपश्यना से हमें वर्तमान में रहने की प्रेक्टिस होती है। और वर्तमान को समता से देखने की भी। ऐसे में मन में विकार पैदा नहीं होते हैं। इससे बाहर के हालात मन की शांति भंग नहीं कर पाते हैं।इसी समता भाव में स्थित होना निर्वाण  है।
     विपश्यना में सर से पांव तक बारी बारी से हर अंग पर कुछ देर रूककर वहां की संवेदना को महसूस किया जाता है।

Comments

  1. Dharmendra Kumar SharmaJuly 7, 2020 at 4:46 AM

    Uttam vichar parantu bhsha thodi kathin hai.

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