जीवन का आधार है गुण।


विश्व की प्रत्येक वस्तु में सुख, दुख तथा उदासिनता उत्पन्न करने की शक्ति मौजूद है। सुख, दुख तथा उदासिनता का कारण सत्व,रजस तथा तमस गुण हैं। इन्हीं गुणों के कारण हर व्यक्ति का। स्वभाव अलग- अलग होता है।हर वस्तु अलग-अलग स्वभाव तथा आकार में नज़र आती हैं।तमो गुण आलस्य , उदासी तथा निष्क्रियता का प्रतीक है।इसका प्रभाव व्यक्ति अकर्मण्य बनाता है।रजस गुण सक्रियता है । यह हमारे शरीर में हमारी इच्छाओं का प्रतीक है संसार में जितना भी विकास हो रहा है वह सब रजस गुण का परिणाम है । इसलिए श्री मद भगवद गीता में श्री कृष्ण भगवान कहते हैं कि काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्ववः । महाशनो महापाप्मा विद्वयेनमिह वैरिणम् ।। अर्थात रजोगुण से उत्पन्न यह काम है,यही क्रोध है।यह बहुत खानेवाला और महापापी है।इसको तु संसार का बैरी जान । रजोगुण इच्छाएं या भोग को भोगने के वे समस्त प्रयास है। भोगने का जुनून है जज्बा है। यदि यह तमो गुण के साथ मिलकर वे घृणित प्रयास है,अपराध है जिन्हें पाना भी परन्तु बिना प्रयास के। तब यह रजोगुण घातक हो जाता है। सत्व गुण शांति, सौहार्द तथा सम भाव है। बिना किसी आकर्षण के प्रयास है जिसमें जीवन को सार्थक बनाने के कर्म है जो बिना किसी व्यक्ति को दुःख ,हानी तथा शोषण से प्राप्त होते हैं। यहां प्रयास है पर संतोष के साथ ऐसा भाव जो हर परिस्थिति में ईश्वर के प्रति आभार तथा कृतज्ञता प्रकट करता है।हर व्यक्ति को ईश्वर की संतान के रूप में मानता है। रजोगुण जब सत्व से मिलता है तब वह स्वयं की उन्नति के साथ दूसरों की उन्नति को भी महत्व देता है वह किसी का फायदा, शोषण नहीं चाहता। उसमें स्वयं की उन्नति के साथ दूसरों का परोपकार जुड़ा होता है। इसलिए हर व्यक्ति में किसी घटना को लेकर अलग-अलग अनुभूति होती है। एक व्यक्ति इन गुणों को कुछ तरिको से नियंत्रित कर सकता हैं। सात्विक भोजन, वर्तमान पर केन्द्रित रहकर तथा अनुशासित जीवन जी कर एक अच्छी लाइफ स्टाइल बना सकता है। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

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