श्रीमद्भागवत तथा मनोविज्ञान
श्रीमद्भागवत तथा अध्याय दो तथा इसका मनोविज्ञान:
पहले अध्याय में अर्जुन मोह ग्रस्त हो जाता है। भगवान कृष्ण अर्जुन से पूछते है कि यह मोह कहां से आया।
आगे अर्जुन कहता है कि कायरता से मेरा स्वभाव ढंक गया,चित्त मोह ग्रस्त हो गया। मैं तुम्हारा शिष्य हूं, मैं आपकी शरण में हूं, तुम मुझे उपदेश दो।
भगवान अर्जुन के मोह को दूर करने हेतु आत्मा के बारे में बताते हैं। आत्मा अविनाशी है,न शस्त्र से कट सकती है नहीं क्षयह जल सकता है, न हीं गलने वाला है और न ही सुखने वाला है। जन्में हुए की मृत्यु निश्चित है तथा मरे हुए का पुनर्जन्म निश्चित है।यह शोक किसके लिए कर रहा है।
धर्म युद्ध में ही कल्याण है।सुख - दुःख,लाभ- हानि ,जय - पराजय को समान समझकर फिर तुम युद्ध के लिए तैयार हो जा ।इस प्रकार युद्ध करने से तुम पाप को प्राप्त नहीं होगा।
केवल तेरा अधिकार कर्म पर है इसका तात्पर्य है बिना आसक्ति के कर्म कर जो भी फल प्राप्त हो उसे सहजता से स्वीकार करने वाले को कोई बंधन नहीं है।जब व्यक्ति आसक्ति का त्याग करके समत्व भाव से कर्म करता है ,यह समत्व भाव ही "योग" है।
इसके विपरित यदि व्यक्ति में किसी भी विषय के प्रति आसक्ति है तब न मिलने पर क्रोध उत्पन्न होता है,क्रोध से मूढ़ भाव उत्पन्न होता है और मूढ़ भाव से स्मृति का नाश हो जाता है स्मृति नाश होने से बुद्धि नष्ट हो जाती है और व्यक्ति का पतन हो जाता है।
अब द्वितीय अध्याय के मनों विज्ञान को समझते है- स्पष्टत: द्वितीय अध्याय हमें यह सिखाने का प्रयास करता है कि आत्मा को छोड़कर सभी नश्वर है। इसलिए नाशवान वस्तुओं के प्रति न आसक्ति होनी चाहिए और न ही मोह होना चाहिए।यह मोह हि हमें किसी भी स्थिति से जोड़ता है।हम जब किसी स्थिति से जुड़ते हैं तो हमें उससे सुख-दुख की अनुभूति होती है और यही सुख और दुख की अनुभूति हमारे संस्कारों के रूप में जमा होती है।
अर्थात किसी चीज से मोह है तब आपको उसके खोने का भय होगा और परिणाम स्वरूप आप प्रयास करते हैं उसे बचाने के परन्तु सभी वस्तुएं नशवर है ये प्रयास ही हमें सुख दुःख की अनुभूति देते हैं। यहीं बन्धन है।
इसके विपरित जब हम सुख तथा दुःख की स्थिति से परे होते हैं तो हम किसी भी लक्ष्य , स्थिति या निर्णय से जुड़ नहीं पाते हमारा ध्यान केवल कर्म पर होता है। यदि हमारा ध्यान केवल कर्म पर है तब उसके जो भी परिणाम प्राप्त हो उसे स्वीकार करने की स्थिति में होते हैं। उससे अच्छे बूरे की अनुभूति नहीं होती।
यह स्थिति ही "योग" है।

Atti uttam vichar.
ReplyDeleteAise vishayon par anya blogs bhi likhe ��������
सराहना के लिए बहुत आभार
Delete🙏🙏😊
जी कोशिश करुंगी
Delete🙏🙏
Awesome interpretation!����
ReplyDeleteThank you ❤️😊
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